शुंग एवं सातवाहन कालीन स्थापत्य कला

  शुंग एवं सातवाहन कालीन स्थापत्य कला

 

शुंग काल की शुरुआत पुष्यमित्र शुंग के शासन काल से मानी जाती है| कला के क्षेत्र में इस काल में अनेक केन्द्रों में स्थापत्य एवं शिल्प का व्यापक प्रचार हुआ।प्रमुख रूप से यह काल स्तूपों के निर्माण के लिए जाना जाता है |इस काल में उत्तर भारत में तीन बड़े स्तूपों का निर्माण हुआ |उदाहरण के तौर पर भरहूत (सतना मध्य प्रदेश ),साँची (रायसेन मध्य प्रदेश) एवं बोध गया है |इन स्तूपों का आधारिक स्तर पर निर्माण अशोक के काल में हुआ था |शुंग शासन के दौरान इन स्तूपों का सौंदर्यीकरण किया गया |साँची के एक अभिलेख से स्पष्टहोता है | बढई एवं दस्तकारों को पत्थर के ऊपर नक्काशी के काम के लिए बड़ी संख्या में लगाया गया|

 

साँची का स्तूप

                     अभिलेखों में साँची के महास्तूप का नाम ‘महा चैत्य गिरी’ है| यहाँ से तीन स्तूपों की प्राप्ति हुई है | साँची के स्तूपों में ‘’सारिपुत्र’’ एवं ‘’मोग्दागालयन’’ के अस्थि अवशेष रखे गये हैं| इस स्तूप को बलुआ पत्थर से सजाया गया | स्तूपों के चारों ओर तोरण को  बौद्ध धर्म की कथाओं विशेषकर जातक कथा के  दृश्यों से अलंकृत किया गया है | मूर्तिकला की दृष्टिकोण से भी यह स्तूप उत्तर भारत के मंदिरों में भी सर्वश्रेष्ठ उदहारण है| यहाँ बनी सालभंजिका कि मूर्ति भारतीय कला में विशिष्ट स्थान रखते हैं |

 

 

भरहूत का स्तूप  

                    यह लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है |यहाँ कि कला विशुद्ध रूप से ग्रामीण कला है | यहाँ तोरण के साथ साथ वेदिकाओं को भी अलंकृत किया गया है | भरहूत में बौद्ध कथाओं के अतिरिक्त यक्ष यक्षिणी  की मूर्तियां बने गयी हैं यक्षिणी कि मूर्ति में चंदा यक्षिणी की सबसे प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली है | इसके अतिरिक्त भरहूत में चूला कोका देवता एवं सिरीमा देवता का भी अंकन किया गया है |भरहूत के स्तूप के अवशेष कलकत्ता के इंडियन म्युजियम में  सरक्षित एवं संग्रहित किया गया है |

 

बोध गया का स्तूप                  

        स्तूप को बोध गया के महाबोधि मंदिर परिसर से शुंग कालीन वेदिकाओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं| ये वेदिकाएं पुष्प  से अलंकृत एवं सुज्जजित हैं | वेदिकाओं पर बने पुष्प  के मध्य मानव आकृति का निर्माण किया गया है |