मौर्यकालीन स्थापत्य कला

मौर्यकालीन स्थापत्य कला

मौर्यकालीन राज प्रसाद के प्रमाण आधुनिक पटना के कुंभहार नामक स्थान पर प्राप्त हुए हैं यहां से बड़ी संख्या में लकड़ियों के विशाल खंड उत्खनन के पश्चात प्रकाश में आए। पटना से ही बुलंदीबाग नामक स्थल से पत्थर के स्तंभ -शीर्ष (Stone capital)प्राप्त हुए हैं। मेगास्थनीज के अनुसार तत्कालीन पाटलिपुत्र पश्चिमी दुनिया के सबसे ज्यादा सुंदर  यहां लकड़ी एवं पत्थरों का प्रयोग भवन निर्माण के लिए किया गया था अर्थशास्त्र में दुर्ग विन्यास प्रकरण से मौर्यकालीन किलेबंदी के बारे में विशेष जानकारी उपलब्ध हुई है।

                   मौर्यकालीन अशोक स्तंभ चूना बलुआ पत्थर के बने हैं यह एकाश्क (Monolithic) है। इन स्तंभों के ऊपर सिंह गज, वृषभ की मूर्तियां लगाई गई थी।विशेष रूप से सारनाथ एवं सांची के स्तंभ शीर्ष चार सिंह वाली मूर्तियों से सुसज्जित है।अन्य प्रमुख स्तंभों में रामपुरवा (बिहार) से प्राप्त वृषभ स्तंभ विशेष महत्व के हैं ।

 

 पुरानी फोटो जो खुदाई के समय मिली                             यह फोटो वर्तमान समये मे राष्ट्रपति भवन मे स्थापित की गयी है 

मौर्य काल मेंपहली बार पत्थरों को काटकर बराबर पहाड़ की गुफाएं यही शैल गुहा  रॉक कट की बनाने की विधि भी प्रचलित हुई।इसी युग की गुफाओं में मगध के प्रमंडल की  सुदामा ऋषि की गुफा, लोमश ऋषि की गुफा ,गोपी की गुफा ,विश्व झोपड़ी ,आदि महत्वपूर्ण हैं इनमें सबसे अलंकृत है लोमश ऋषि की गुफा का द्वार जिसके ऊपर कास्ट कला का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। नागार्जुनी पहाड़ी की गुफाएं एवं सीतामढ़ी की  गुफा भी मौर्य काल के प्रस्तर शिल्प के प्रमुख उदाहरण हैं इन गुफाओं की दीवारों पर एक विशेष प्रकार की चमक दिखाई पड़ती है जिसे साधारणतया मौर्य पॉलिश कहा जाता है यह चमक अशोक कालीन स्तंभों के समान है मौर्य काल में स्तूपो का बड़ी संख्या में निर्माण हुआ अशोक को 84000 स्तूप के निर्माण का श्रेय दिया जाता है।अशोक कालीन स्तूप मिट्टी के ढेर के ऊपर ईटों के द्वारा निर्मित किए गए थे जिसके चारों ओर लकड़ी की वेदिकाओं का प्रयोग किया गया था कालांतर में इन्हीं स्तूपों के ऊपर विशेषकर सांची एवं भरहुत स्थल पर शासनकाल में पत्थरों का सुंदर प्रयोग किया गया है।

बराबर पहाड़ की गुफाएं