वैदिक कालीन स्थापत्यकला

वैदिक कालीन स्थापत्यकला

सामान्यतः यह माना जाता है| कि वैदिक अर्थव्यवस्था पशु-चारणिक थी| ऋग्वेद में कृषि सम्बंधित एवं स्थाई गांव के विषय में दिए गए उद्धरणअत्यंत कम हैं|

                        फिर भी यह अनुमानित करना गलत न होगा कि ऋग्वेदिक आर्य मिटटी एवं लकड़ी के बने भवनों में निवास करते थे| सामान्य रूप से घर के लिए वेदों में “सदम एव “दम शव्द प्रयोग में आयें हैं |एक कमरे वाले मकान के लिए एक वैश्मिन” दो कमरों  वाले कमरे को “द्वि वैश्मिन” बहुत सारे कमरों के लिए बहुवैश्मिनकहा  जाता ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक काल में साल वृक्ष के टहनियों का प्रयोग मकानो के निर्माण  में विशेष रूप से हुआ करता था | इसी से कालांतर में पाठशाला एवं पाकशाला  जैसे शव्दों का प्रचलित हुआ| भवनों के निर्माणमें लकड़ी  के स्तम्भों का प्रयोग किया जाता रहा होगा |वेदों में स्तम्भों के लिए स्थूण शब्द का प्रयोग किया गया | दरवाजों के लिए दूरोण (दरवाजे के वाहर बैठने का स्थान ) शव्द का प्रयोग किया गया |

                                                                         हरियाणा के भगवानपुरा नामक स्थल से 13 कमरों वाले मिटटी के एक मकान का साक्ष्य मिला है|उत्तर प्रदेश के अहिछत्र नामक स्थान से  दुर्गीकरण के प्रयोग तथा अग्निवेदिकाओं के साक्ष्य प्राप्त हुए हैं |चूँकि वेदिक काल में ईंट या पत्थर जैसे सामग्रिओं जैसे का प्रयोग नहीं हुआ अतः उस युग के स्थापत्य के पुरातात्विक साक्ष्य नहीं के बराबर मिले हैं|

                                                                          उत्तर वैदिक कालीन में अथर्ववेद एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है |जिसमे उत्तम ,मध्यम एवं अवंम तीन खण्डों में विभाजित नगर का पहली वार  उल्लेख हुआ है|